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समझ रहे हैं चाल तुम्हारी - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

              ग़ज़ल-            समझ रहे हैं  चाल तुम्हारी,           वाणी क्यों वाचाल तुम्हारी।           मतलब  से  बातें  है  करता,           सोचो क्या है  हाल तुम्हारी।          शब्दों का  आडम्बर  रच कर,          नहीं लगेगी सुर ताल तुम्हारी।           अपना सदा अपना ही रहेगा,           काली है सब  दाल  तुम्हारी।           लाख सहारा  छल का  ले लो,           टूट  रही  सब  ज़ाल  तुम्हारी।           समय से पहले कुछ ना मिलेगा,           अब  ना  गलेगी  दाल  तुम्हारी।            भले  बनो  तुम  ज्ञान  सुभीता, ...