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कोरोना काल में एक नई रचना कोरोना शीर्षक से नई रचना क्या लिखूँ और क्या सुनाऊँ...

कोरोना काल में एक नई रचना कोरोना शीर्षक से नई रचना क्या लिखूँ और क्या सुनाऊँ...

क्या लिखूँ......

क्या लिखूँ और क्या सुनाऊँ,
देश की जनता का बखान करुँ,
या प्रधानमंत्री के गुण गाऊँ।

पीएम ने संवेदनशीलता दिखाई,
देश की जनता को,
कोरोना से बचने की अपील लगाई,
21दिन घर में रह सोशल दूरी को सुझाई,
पर जनता ही जनता के प्रति,
हृदयहीनता दे रही दिखाई।

राजा प्रजा की तरह बन गया,
सामान्य जन परिपक्व बनने से रह गया,
ईश्वर से वह बुद्धि तो बहुत पाई,
पर छोटे से हृदय को विशाल नहीं कर पाई।

कोरोना क्रूरता से भरी पड़ी है,
वह कोई परोक्ष वीर नहीं है भाई,
कोरोना करता है चुपके से अमानवीय युद्ध,
न थी कोई बदले की लड़ाई,
न ही कोई आपसी रंजिश मेरे भाई।

कोरोना का कहीं आतंक से सांठ-गांठ तो नहीं,
व्याकुल कोरोना कर रहा मानवों का ह्रास ऐसे,
अंतकाल ने तो मुँह खोल ही दिया है जैसे।

दयानन्द त्रिपाठी
    व्याकुल
लक्ष्मीपुर, महराजगंज, उत्तर प्रदेश।

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