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नूतन लाल साहू

याद आता है मेरा बचपन

जब मेरा चंचल बचपन था
महा निर्दयी मेरा मन था
कलियों को फूल खिलनें नही देता
छेद छेद कर हार बनाता
याद आता है मेरा बचपन।
मै दंड से भय नही खाता
चालाकी कर मैं इतराता
सोच इसे, आंहे भरता हूं
क्रूर कार्य कैसे करता था
याद आता है मेरा बचपन।
दिन को होली रात दिवाली
प्यार बरसता था मुझ पर
कुछ क्षण दुश्मनी कुछ क्षण में दोस्ती
याद आता है मेरा बचपन।
वो दिन बीता वो रात गई
चिंता की कोई बात नही था
भूला सभी उल्लास को मैने
कितना अकेला आज हूं मैं
याद आता है मेरा बचपन।
बचपन में थे सुख दिन भी
बचपन में थे दुःख के दिन भी
अब उर की पीड़ा से रोकर
त्राहि त्राहि कर उठता है जीवन
याद आता है मेरा बचपन।
सौ समस्यायें खड़ी है अब
हल नही है पास मेरे
बचपना में था ऐसा जादू
कर लेता था बस में, लोगों को
याद आता है मेरा बचपन।

नूतन लाल साहू


जीवन महासंग्राम है

अपने से ही उलझों
अपने से ही सुलझों
यहां दिमाकी कसरत है।
समय स्वयं ही नही बदलता
सबको बदलता जाता है
पथ पर टटोलकर चलना है
धैर्य से सुन,मेरी बात को
अपनी बोली की मिठास से
छु सकता है,आसमान को
अपने से ही उलझों
अपने से ही सुलझाें
यहां दिमाकी कसरत है।
मेहनत से कमाते रहना
मेहनत का खाते रहना
मालिक ने जो भी किया है
मालिक ने जो भी दिया है
उनका गुण गाते रहना
अपने से ही उलझों
अपने से ही सुलझों
यहां दिमाकी कसरत है।
दुनिया बड़ी ओंछी है
औरौ को खुश देख,जलते हैं
बड़ा ही दुखी है मेरा मन
किंतु विवेक चुप है
क्रोध से समस्या का हल
कभी नही होता
जीवन तो महासंग्राम है
पथ पर टटोलकर चलना है
लक्ष्य भी खुद को तय करना है
अपने से ही उलझों
अपने से ही सुलझों
यहां दिमाकी कसरत है।

नूतन लाल साहू

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