सीधे मुख्य सामग्री पर जाएं

विजय कल्याणी तिवारी

प्रखर संकल्प
-------------------------------
है प्रखर संकल्प तो याचना से मुक्त हो
जोड़ कर उर्जा अगम साहसी संयुक्त हो।

भय भ्रमित होने से जीवन नर्क हो जाए
इस बहस मे क्या पता कुछ तर्क हो जाए।

भागने से कब हुआ हासिल किसे बोलो
गांठ जितने हैं लगो उसको जरा खोलो।

गांठ जब रिसने लगे तो दर्द होना है
अवहेलना से हर सबब को सर्द होना है।

साथ जो रहता हमेशा यार वह संकल्प है
मान ले वह शेष जीवन हर कदम पर अल्प है।

यह प्रखरता ही तुम्हें शीर्ष तक पहुंचाएगा।
नासमझ हैं जो जगत उनको धरा ले आएगा।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छ.ग.



,,तुम तजि जाउं मै कहाँ,,
--------------------------------
तुम तजि जाउं मै कहाँ कौन रखे है मान
मै मूरख निज धर्म से अब तक था अनजान।

सब जागे मै सो रहा मद मदाँध से चूर
दुख का कारक खुद रहा तुमसे था जब दूर।

आँखन आँसू नित बहे जान सका नहि दोष
जब आया तेरे शरण सुना श्रवण जय घोष।

चिंता नहि दुख व्याधि की हँस कर सहूँ विषाद
सहज वृत्ति से मिट गया अंतस भरा प्रमाद।

महिमा तेरे नाम की अब जाना सिय राम
सहज शाँत जीवन तुम्ही तुम्ही चीर विश्राम।

अब जाना निज धर्म को चाहूँ करूँ निबाह
तुम दीपक बनकर जले सदा भगति की राह।

राम मुझे राखो शरण भटक न जाउं पाथ
चरणामृत नित नित मिले मुझको दीनानाथ।

विजय कल्याणी तिवारी, बिलासपुर छ.ग.

टिप्पणियाँ

इस ब्लॉग से लोकप्रिय पोस्ट

रक्तबीज कोरोना प्रतियोगिता में शिक्षक दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल को मिला श्रेष्ठ साहित्य शिल्पी सम्मान

रक्तबीज कोरोना प्रतियोगिता में शिक्षक दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल को मिला श्रेष्ठ साहित्य शिल्पी सम्मान महराजगंज टाइम्स ब्यूरो: महराजगंज जनपद में तैनात बेसिक शिक्षा परिषद के शिक्षक व साहित्यकार दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल को श्रेष्ठ साहित्य शिल्पी सम्मान मिला है। यह सम्मान उनके काव्य रंगोली रक्तबीज कोरोना के चलते मिली है। शिक्षक दयानन्द त्रिपाठी ने कोरोना पर अपनी रचना को ऑनलाइन काव्य प्रतियोगिता में भेजा था। निर्णायक मंडल ने शिक्षक दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल के काव्य रंगोली रक्तबीज कोरोना को टॉप 11 में जगह दिया। उनकी रचना को ऑनलाइन पत्रियोगिता में  सातवां स्थान मिला है। शिक्षक दयानन्द त्रिपाठी को मिले इस सम्मान की बदौलत साहित्य की दुनिया में महराजगंज जनपद के साथ बेसिक शिक्षा परिषद भी गौरवान्वित हुआ है। बेसिक शिक्षा विभाग के शिक्षक बैजनाथ सिंह, अखिलेश पाठक, केशवमणि त्रिपाठी, सत्येन्द्र कुमार मिश्र, राघवेंद्र पाण्डेय, मनौवर अंसारी, धनप्रकाश त्रिपाठी, विजय प्रकाश दूबे, गिरिजेश पाण्डेय, चन्द्रभान प्रसाद, हरिश्चंद्र चौधरी, राकेश दूबे आदि ने साहित्यकार शिक्षक दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल को बधाई दिय...

सीता ने जिद ठाना है अब व्यर्थ ही समझाना है - चन्द्र मोहन पोद्दार

जनक नन्दिनी "सीता कहती है जाना  जहां स्वामी वही ठिकाना ! बिन पति मैं कैसे रहूंगी? एक पल भी जी ना सकूंगी !" माता का मन घबराता बिन पुत्र नहीं रह पाता। " मैं महल में नहीं रहूंगी तेरे संग ही वन को चलूंगी" दुविधा में राम पड़े थे  क्या कहे ये सोच रहे थे  दोनों जिद करती जाती राम को थी उलझाती। तब राम ने डर दिखलाया फिर वन के कष्ट बताया  कुछ नीति नियम समझाया  कुछ कटु वचन भी सुनाया। "मेरा जाना कठिन करो ना असमंजस में रखो ना  आदेश पिता का मिला है  जल्दी पूरा करना है" फिर माता को समझाया  उसे पत्नी धर्म बताया- "जहां पति रहे वहीं रहना  पति को ही स्वामी समझना मां यदि तुम्हें है चलना आदेश पिता का लेना वरना धीरज रख लेना  जिद और नहीं अब करना।" "हे सीते तुम भी मानो  मेरी दुविधा को तो जानो  वनवास सहज नहीं होता  कंटक कभी जलज ना होता बड़े कष्ट मिलेंगे वन में  नहीं सुख कोई जीवन में  कभी हिंसक पशु मिलेंगे  दानव पिशाच घेरेंगे ! फलहार ही करना होगा  भूखे भी रहना होगा कांटों पर चलना होगा  धरती पर सोना होगा । मौसम प्रतिकूल मिलेग...

डॉ0 हरि नाथ मिश्र

लेखनी के यशस्वी पुजारी- कालिदास की उपमा उत्तम,बाणभट्ट की भाषा, तुलसी-सूर-कबीर ने गढ़ दी,भक्ति-भाव-परिभाषा। मीर व ग़ालिब की गज़लों सँग,मीरा के पद सारे- "प्रेम सार है जीवन का",कह,ऐसी दिए दिलासा।।                       बाणभट्ट की.........।। सूत्र व्याकरण के सब साधे,अपने ऋषिवर पाणिनि, वाल्मीकि,कवि माघ सकल गुण, पद-लालित्य में दण्डिनि। कण्व-कणाद-व्यास ऋषि साधक,दे संदेश अनूठा- ज्ञान-प्रकाश-पुंज कर विगसित,हर ली सकल निराशा।।                    बाणभट्ट की.............।। गुरु बशिष्ठ,ऋषि गौतम-कौशिक,मानव-मूल्य सँवारे, औषधि-ज्ञानी श्रेष्ठ पतंजलि,रोग-ग्रसित जन तारे। ऋषि द्वैपायन-पैल-पराशर,कश्यप-धौम्य व वाम- सबने मिलकर धर्म-कर्म से,जीवन-मूल्य तराशा।।                 बाणभट्ट की.............।। श्रीराम-कृष्ण,महावीर-बुद्ध थे,पुरुष अलौकिक भारी, महि-अघ-भार दूर करने को,आए जग तन धारी। करके दलन सभी दानव का,ये महामानव मित्रों- कर गए ज्योतिर्मय यह जीवन,जला के दीपक आशा।। ...