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विजय कल्याणी तिवारी

प्रखर संकल्प
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है प्रखर संकल्प तो याचना से मुक्त हो
जोड़ कर उर्जा अगम साहसी संयुक्त हो।

भय भ्रमित होने से जीवन नर्क हो जाए
इस बहस मे क्या पता कुछ तर्क हो जाए।

भागने से कब हुआ हासिल किसे बोलो
गांठ जितने हैं लगो उसको जरा खोलो।

गांठ जब रिसने लगे तो दर्द होना है
अवहेलना से हर सबब को सर्द होना है।

साथ जो रहता हमेशा यार वह संकल्प है
मान ले वह शेष जीवन हर कदम पर अल्प है।

यह प्रखरता ही तुम्हें शीर्ष तक पहुंचाएगा।
नासमझ हैं जो जगत उनको धरा ले आएगा।

विजय कल्याणी तिवारी
बिलासपुर छ.ग.



,,तुम तजि जाउं मै कहाँ,,
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तुम तजि जाउं मै कहाँ कौन रखे है मान
मै मूरख निज धर्म से अब तक था अनजान।

सब जागे मै सो रहा मद मदाँध से चूर
दुख का कारक खुद रहा तुमसे था जब दूर।

आँखन आँसू नित बहे जान सका नहि दोष
जब आया तेरे शरण सुना श्रवण जय घोष।

चिंता नहि दुख व्याधि की हँस कर सहूँ विषाद
सहज वृत्ति से मिट गया अंतस भरा प्रमाद।

महिमा तेरे नाम की अब जाना सिय राम
सहज शाँत जीवन तुम्ही तुम्ही चीर विश्राम।

अब जाना निज धर्म को चाहूँ करूँ निबाह
तुम दीपक बनकर जले सदा भगति की राह।

राम मुझे राखो शरण भटक न जाउं पाथ
चरणामृत नित नित मिले मुझको दीनानाथ।

विजय कल्याणी तिवारी, बिलासपुर छ.ग.

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