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छत्र छाजेड़ फक्कड़

प्रेम
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छत्र छाजेड़ “फक्कड़”

प्रेम
करीजै कद
पण
ठा पड़ै
होज्यावै जद...

मींरा
बावळी
छोड्यो राजपाट
फिरी
घाट घाट....

राधा
गिरस्ती संभाळी
पण 
हिये मोहन स्यूं
प्रीत पाळी....

सलीम
अनारकळी नै
चाही घणैमान
कर बाप स्यूं बग़ावत
मचायी घमसाण....

ओ प्रेम भी
होवै
अजब ग़ज़ब
बसै मन
झरै नयन
मरजाद भूलज्या
रिस्ता बापड़ा
कठै रा कठै झूलज्या
पण 
सो कीं दूजै पासै
कुण खटकै आसै पासै
जद
प्रेम होज्या.....


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धुंवे का रहस्य
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छत्र छाजेड़ “फक्कड़”

धुंवे से
ढका हो जब
व्यक्तित्व 
मुश्किल होता है
बोलना.....

शब्द
पिघलने लगते हैं
अंदर ही अंदर
और
अचानक
सामने आता है प्रश्न
कि
आख़िर 
ये धुंवा आ कहाँ से रहा है...?

नज़रें 
ढूँढने लगती है
धुंवे का रहस्य
पर
अब धुंवा
कहाँ रह गया धुंवा
एकाकार हो गये
धुंवां और व्यक्तित्व 
लोप हो गया
धुंवे का रहस्य
धुंवे में

फक्कड़ का नमन

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