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स्नेहलता पाण्डेय स्नेह

आप सभी को बेटी दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं 🌹🌹🙏🙏

क्यूँ परेशान हो जाते हैं ?
बेटी के माँ बाप,
बेटी को यदि शाम को,
घर आने में देर होने लगती है।
माथे पर शिकन दिखती है,
क्योंकि वह बेटी के माँ बाप हैं।
मालूम है उन्हें समाज के कुछ,
खतरनाक भेड़ियों के बारे में।
दोमुहें चेहरे वालों शैतानों और,
नृकृष्ट हैवानों के बारे में।
जो घूम रहे हैं इधर उधर,
सड़कों पर मंदिरों में गली मौहल्लों में,
यहाँ तक कि घर की छतों पर भी।
कहाँ रहे कहाँ जाये बेटी?
चाचा,मामा,ताऊ,मौसा, जीजा,फूफा,
या कोई अजनबी  इंसान,
बचे किसकी किसकी कामुक नज़रों से।
रिश्तों की दुहाई दे या अपने आबरू की,
इन्हें परवाह नहीं स्त्री के सम्मान की।
ये भी नहीं सोचते कि,
इनकी, माँ, और बहन भी एक स्त्री है।
अगर इनके साथ वैसा ही हो,
जो ये एक  मासूम ,बेटी,बहन और,
किसी की माँ के साथ करते हैं।
केवल बेटी दिवस पर ही क्यों हम,
बेटी के मान सम्मान की बात करते हैं?
उसे हर वो अधिकार क्यों नहीं मिलता,
जो इस समाज ने बेटों को दिया है?
कर्तव्य का बोझ बेटों से ज्यादा,
बेटियों के सिर पर क्यों पड़ा है?

स्नेहलता पाण्डेय 'स्नेह'
26/8/21

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