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मार्कण्डेय त्रिपाठी

सत्यमेव जयते

सत्यमेव जयते, अब छोड़ो ,
आज झूठ का हुआ ज़माना ।
सिसक रहा है सत्य चतुर्दिक,
ढूंढ़ रहा है आज ठिकाना ।।

सत्य बात कहने वालों को,
छुप छुप कर जीना पड़ता है ।
हरिश्चन्द् बनते फिरते हैं ,
यह ताना सुनना पड़ता है ।।

जो जितना ही झूठ बोलता,
वह उतना ही सफल कहाता ।
कलियुग के इस प्रथम चरण में,
वही आज डटकर मुस्काता ।।

झूठों के समूह के आगे ,
सत्य अकेला पड़ जाता है ।
फंस जाता वह सत्य बोलकर,
कभी, कभी वह अड़ जाता है ।।

सभी सत्य की हंसी उड़ाते ,
उसे धमकियां दी जाती हैं ।
साक्ष्य ढूंढ़े जाते विरोध में,
सच्चाई तब मुरझाती है ।।

कौरव अट्टहास करते हैं ,
पाण्डव अब भी यहां भटकते ।
पता नहीं, अब कृष्ण कहां हैं,
संत हृदय अब कहें अटकते ।।

सद्गुण ही अवगुण है अब तो,
बड़ा कठिन है उसका जीना ।
कौन चलेगा सत्य मार्ग पर,
कौन बहाए खून, पसीना ।।

आंखों के सम्मुख सब होता,
पर सबकी बोलती बंद है ।
हिम्मत ही मर गई आज सच,
सिसक रहा यह कवि छंद है ।।

सब सत्ता के चापलूस हैं ,
सब अपना अस्तित्व बचाते ।
दुम हिलाते रहते हरदम,
सब उसके कर्तृत्व छिपाते ।।

हम पर नजर गई गर उनकी,
पता नहीं क्या, क्या तब होगा ।
घर, परिवार सभी बिखरेगा,
ओढ़े रहो सत्य का चोंगा ।।

लक्ष्मी यदि घर में आतीं तो,
बड़ी बुराई भी लाती हैं ।
समझाओ अपनी संतति को,
कैसे फटी आज छाती है ।।

अच्छे घर के बिगड़े बच्चे,
भटक गए हैं उनको टोको ।
नज़र बनाए रक्खो उन पर,
समय शेष है,उनको रोको ।।

पाश्चात्य संस्कृति हावी है,
चकाचौंध का हुआ बसेरा ।
भुगतो अब परिणाम भयंकर,
जब जागो तब हुआ सबेरा ।।

मन विदीर्ण हो जाता इससे,
लगता सब कालिमा मिटा दूं ।
योगासन में सोया है जो,
उस शंकर को अभी जगा दूं ।।

दम घोंटू माहौल चतुर्दिक,
किससे करें आज हम आशा ।
सत्यमेव जयते अब भी है,
पर अब बदली है परिभाषा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी

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