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नूतन लाल साहू

तारे जमीन पर

एक ऊंची दीवार जो
ओढ़ रखी है,तुमने
और कैद कर लिया है
अपने आप को,चारो ओर से।
गीली मिट्टी सा उपजते है
अनेक विचार
मन,रह रहकर मचलता है
सुबह की सुहानी
शीतल सुवासित मलय
अब गर्म हो चुकी है।
अब कहां ढूंढ रहे हो
उस बासंती बहार को
रंग बिरंगी फूल के पौंधे
और पेड़ लगाते चलो।
कितना अच्छा लगता है
सुबह सुबह
हरी घास पर टहलना
शबनम की बुंदे,पांवों को सहलायेगी
ठंडी हवाओं के झोंको से
तारे जमीन पर,नजर आयेगी।
कौन कहता है
रात,आज खामोश है
अनगिनत तारें,आपस में
कुछ फुसफुसाते हुए,टिमटिमाते से
ताक रहे है, जमीं की ओर
प्रकृति से खिलवाड़, न करें
वो धीमें से ली है अंगड़ाई।
अब कहां ढूंढ रहे हो
उस बसंती बहार को
मधुबन को,घर घर में सजा लें
तारें जमीन पर नजर आयेगी।

नूतन लाल साहू

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