/ कबीर -- 10 /
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मन से जो जीता नही सकल जीत तब व्यर्थ
उस मनुष्य के हाथ से होते सदा अनर्थ ।
मन कारक संसार में भले बुरे का मीत
मन के कारण हार है मन के कारण जीत।
कह कबीर भव बंध से मन को पार उतार
मन के शुभ संदेश को समझ सदा उपहार।
झुके माथ प्रभु चरण में कटे जनम के दोष
नित संतुलन बना रहे घटे न अंतस जोश।
कबिरा जग मन भाव से जीवन जगत प्रसिद्ध
नोच नही अंतर हृदय सपनेहु बन कर गिद्ध।
मन उपवन के गंध से मोहित सकल समाज
ऐसे मन का विश्व पर रहे दिवस निशि राज।।
विजय कल्याणी तिवारी, बिलासपुर छ.ग.
/ कबीर -- 9 /
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कह कबीर मन मे दया जो रख सका महान
नीर नयन भर बांटता सच्चा वह इंसान ।
भाव भगति सचमुच सखा जीवन के आधार
नेक राह पर जो चले पाए वह उपहार ।
क्षुद्र क्षुधा से लड़ सके इतन अंतस प्राण
नहि संदेह कभी कहीं फिर मिलने मे त्राण।
कबिरा कलम कठोर हो लिखकर उगले आग
शीतल जल मय हों भरे अंबुज खिले तड़ाग।
नयन देख करूँणा भरे बरसे बनकर नीर
पीर देख होने लगे मनुआ मनुज अधीर।
सुन कबीर के सीख को अंतर हृदय उतार।
कुंठा कलुष कलेश पर चल कर वज्र प्रहार।
विजय कल्याणी तिवारी, बिलासपुर छ.ग.
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