*।।ग़ज़ल।। संख्या 156 ।।*
*।।काफ़िया।। आने ।।*
*।।रदीफ़।। को जी करता है।।*
1
अब वही बातें बनाने को जी करता है।
तेरे पास लौट कर आने को जी करता है।।
2
जाने कहाँ गुम हो गए हैं वह सब दिन।
तेरे पहलू में सर छुपाने को जी करता है।।
3
आप से ही तो थे हमारे दिन रात रोशन।
आप को फिर अपनाने को जी करता है।।
4
जाने क्या क्या नादानी कर बैठे हम भी।
अपनी गलती समझाने को जी करता है।।
5
क्यों कैसे कब यह आ गई थी दूरियां।
आज सब कुछ भुलाने को जी करता है।।
6
महसूस होता नहीं तुम्हारे बिन वजूद हमारा।
तुम पर जान लुटाने को जी करता है।।
7
वही नगमें वही अंदाज़ लौट कर आ जाये।
अब फिर साथ में ही गाने को जी करता है।।
8
*हंस* तुम्हारे बिन जिंदगी कोई जिंदगी नहीं।
तुम्हारे लिए जीने मर जाने को जी करता है।।
*रचयिता।।एस के कपूर "श्री हंस"*
*बरेली।।*
*©. @. skkapoor*
*सर्वाधिकार सुरक्षित*
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