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मार्कण्डेय त्रिपाठी

नसीहत

जल्दी सोना, जल्दी जगना ,
सब कहते अच्छा रहता है ।
सेहत, समृद्धि, बुद्धि बढ़ती ,
मन हरदम बच्चा रहता है ।।

पर आज जमाना बदल गया,
जन देर रात तक जगते हैं ।
संडे स्पेशल होता है ,
डिस्टर्ब न करना, कहते हैं ।।

मुझमें आदत पड़ गई बुरी ,
जल्दी उठ जाया करता हूं ।
कर खटर, पटर की आवाजें,
नित चैन नींद की हरता हूं ।।

खट-पट हो जाती अलस्सुबह,
सब मुंह फुलाए उठते हैं ।
मैं भार रूप अपने घर में ,
सब बेमतलब ही रुठते हैं ।।

कुछ लोग रात भर जगते हैं,
दिन भर खर्राटे लेते हैं ।
गांवों, शहरों की दशा एक,
जागृति संदेश वे देते हैं ।।

सिरहाने रख कर मोबाइल,
नित नींद सहज आ जाती है ।
घंटी बजती रहती, फिर भी
दिनकर किरणें कब भातीं हैं ।।

जो जितनी देर से जगता है,
उतना ही श्रेष्ठ कहाता है ।
वह महापुरुष है इस जग में,
सच में निज भाग्य विधाता है ।।

दिनचर्या बदल गई देखो ,
दिन, रात में अब कुछ फ़र्क नहीं ।
है पृथक्, पृथक् जीवन शैली,
करता मैं इस पर तर्क नहीं ।।

मैं भी चुप रहता सोच समझ,
धीरे से खोलता दरवाजा ।
चल पड़ता करने सुबह सैर,
कहता प्रभुवर अब तो आ जा ।।

जीवन में हे मेरे प्रियवर ,
समझौते होते हैं अनेक ।
यह सफल जीवन का मूल मंत्र,
मत देना इसको कहीं फेंक ।।

एक बात पते की कहता हूं,
मत कहो किसी से व्यथा कथा ।
सहना तुमको ही है सब कुछ,
फिर क्यों इस जग को चले पता ।।

यह परनिर्भर जीवन पड़ाव,
सब अपने हैं, कोई ग़ैर नहीं ।
बस पूर्ण समर्पण भाव रखो,
कुछ बोले तो अब खैर नहीं ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

देवकी और यशोदा

देवकी है मां मेरी यू,पी,
मुंबई यशोदा माता है ।
दोनों से अमिट दुलार मिला,
दोनों से मधुमय नाता है ।।

यू, पी, है जन्मभूमि मेरी ,
तो कर्मभूमि मुंबई प्यारी ।
दोनों का आंचल सिर पर है,
दोनों की महिमा है न्यारी ।।

एक राम, कृष्ण की धरती है ,
तो दूजी, संतों का प्रदेश ।
दोनों की चरण धूलि पावन,
सबके उर में बसते गणेश ।।

हम क्यों आए इस ठौर बन्धु,
सबकी बस एक कहानी है ।
घर में अभाव की स्थिति थी,
छोड़ो वह बात पुरानी है ।।

इस महाराष्ट्र की धरती पर,
हमने पाया अनुपम दुलार ।
सारे दुश्चिंतन दूर हुए ,
मुंबादेवी सुन लीं पुकार ।।

झोला टांगे हम आए थे ,
भर बैग आज घर को जाते ।
मुंबई सपनों की नगरी है,
भरती झोली,जो हैं आते ।।

मायानगरी की कृपा बहुत,
कुछ काम जरूर मिल जाता है ।
मेहनतकश, ईमानदार जन का,
चेहरा निश्चित खिल जाता है ।।

मिनी इंडिया कहलाती यह,
पूरा भारत दिखता इसमें ।
इसकी है अद्भुत छटा सखे,
ऐसा है प्रेम भाव किसमें ।।

फल, सब्जी,दूध, सुरक्षा में,
यू, पी, बिहार के लोग लगे ।
संघर्ष सहर्षित करते हैं ,
मिल जुल रहते, ज्यों खास सगे ।।

सहयोग परस्पर करते हैं ,
लगता जैसे कि बसा गांव ।
दुख,दर्द सभी मिट जाते हैं,
मुंबई है सचमुच सुखद ठांव ।।

सागर तट पर यह बसी मित्र,
सर्दी, गर्मी दोनों सम है ।
है गुजर यहां कम कपड़ों में,
रफ़्तार नहीं इसकी कम है ।।

आर्थिक राजधानी देश की यह,
अंतरराष्ट्रीय शहर भी कहलाती ।
झोपड़ी,महल दोनों दिखते ,
लोकल सबके मन को भाती ।।

सपनों को पूरा करती है,
पहचान सदा दिलवाती है ।
जो यहां रह गया है सचमुच,
स्थली न और सुहाती है ।।

लेकिन देवकी माता की ,
बातें कुछ और निराली हैं ।
आंखों से अश्रु छलक उठते,
उसके बिन यह जग खाली है ।।

जब रेत में नौका फंसती है,
तब याद गांव की आती है ।
संतुलन बनाकर चलते हम,
फिर भी वह याद सताती है ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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