छोड़ दें क्रोध और फूल बन जाओ
क्रोध तो ऐसा हुनर है, प्यारें
जिसमें फंसते भी है और
उलझते भी आप है।
इसीलिए छोड़ दें,क्रोध को
नही तो, पाछे पछताओगे
क्योंकि क्रोध के कारण ही अक्सर
लोग पिछड़ जाते है
इसीलिए छोड़ दें,क्रोध को प्यारें।
तुम फूल बनकर के तो देखो
कांटे भी,सुरक्षा में लग जायेंगे,
समय कहता है,तुम प्लान करो
सबसे पहले
भाग्य कहता है,तुम फूल बनो
सबसे पहले।
अगर तुम,फूल बनते हो
तो सब मित्र,बन जायेंगे तुम्हारें,
आदिकाल से, प्रिय है सबको
तुम फूल बन जाओ, प्यारें।
चाहे सुबह हो,चाहे शाम हो
तेरा आदर,सब कोई करेंगे,
फूल के आगे, नतमस्तक तो
सारे जहां है।
क्रोधी को, कोई भाता नही है
इस सारे जहां में
क्रोध तो ऐसा हुनर है, प्यारें
जिसमें फंसते भी है और
उलझते भी है।
मुट्ठी बांध कर,आया है जग में
हाथ पसारे जाना है
अगर कुछ पहचान बनाना है
तो फूल बन जाओ, प्यारें।
नूतन लाल साहू
देखोंं, ऐसे टूट न जाना
सुख पर्वत की विशालता में नही है
शायद एक कण में है
सुख वर्षो की सुदीर्घता में नही है
शायद एक क्षण में है।
सुख, दुःख का और
दुःख,सुख का मीत है
बुने जाते है,करीने से।
शिकायत अगर कोई
रखता हो तुमसें
पलट के तुम उससे
शिकायत न करना।
ये दुनिया है,अजब निराली
देखो, ऐसे टूट न जाना।
घुल घुल कर बातें करो
खुल खुल कर बातें करो
अपमान की संभावना
बहुत है जग में।
सांच को,क्या आंच प्यारें
तू क्यो घबराता है
परिस्थितियों से।
सागर से निकला
सीपी में पला
आभा से भरपूर
रूप में है,ढला
जैसे मोती होती है,बहुमूल्य
वैसा ही,आभा है तेरा।
जिंदगी है, एक हरमुनिया
सुख और दुःख
सफेद और काली पट्टी है
सामने है तेरे, झुठी दुनिया
परोपकार तू,किए जा निरंतर
देखो, ऐसे टूट न जाना।
नूतन लाल साहू
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