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मार्कण्डेय त्रिपाठी

बुढ़ापा और वरिष्ठता

बुढ़ापा और वरिष्ठता में अंतर है,
बुढ़ापे का नाम न लो,छू मंतर है ।
हम वरिष्ठ हैं, बूढ़े नहीं,यह ध्यान रहे,
सचमुच यह जीवन पड़ाव मध्यांतर है ।।

बुढ़ापा आधार चाहती ,
वरिष्ठता देती आधार ।
जीवन का अद्भुत रस इसमें,
इसकी महिमा अपरम्पार ।।

लोग छिपाते निज बुढ़ापा ,
वरिष्ठता को दिखलाते ।
वरिष्ठता आदर पाती है ,
समझ रहे हो क्या भ्राते ।।

अहंकार होता बूढ़ों को ,
और वरिष्ठ अनुभव सम्पन्न ।
वरिष्ठता में संयम होती ,
कभी न वह होती विपन्न ।।

वैचारिक मतभेद बुढ़ापा ,
युवा सोच से है बेमेल ।
वरिष्ठता में तालमेल है ,
सच में यह जीवन का खेल ।।

हमारे जमाने में ऐसा था,
रटती रहती बुढ़ापा ।
वरिष्ठता को सब स्वीकार है,
कभी नहीं खोती आपा ।।

बुढ़ापा निज राय थोपती ,
इसीलिए होता मतभेद ।
तरुण पीढ़ी को सदा समझती,
यह वरिष्ठता का मनभेद ।।

बुढ़ापा जीवन का अंत है ,
और वरिष्ठता सुबह तलाश ।
युवा शक्ति को प्रेरित करती,
और जगाती रहती आस ।।

दोनों में अंतर है सचमुच ,
सदा रखो इसका तुम ध्यान ।
चिंतन मनन करो निशि वासर,
कभी न करना मन को म्लान ।।

उम्र कोई भी हो, जाने दो ,
रखो सदा मन में उत्साह ।
सदा फूल की तरह हंसो तुम,
कभी न कहना मन से आह ।।

यह जीवन भी एक उत्सव है,
सदा करो इसका रसपान ।
बूढ़े नहीं, वरिष्ठ बनो तुम ,
सदा मिलेगा तुमको मान ।।

घर में जो होता, होने दो ,
व्यर्थ न देना कभी सलाह ।
ध्यान रहे अपनी इज्जत का,
सबकी पृथक् पृथक् है चाह ।।

आंख,कान, मुंह बंद रखो तुम,
जो चाहो अपना सम्मान ।
नई सोच अपना लो प्यारे ,
मत करना अपना गुण गान ।।

हां में हां मिलाना सीखो ,
ना कहना,भूलो तुम आज ।
भोजन, पानी तभी मिलेगा ,
बने रहोगे तुम सरताज ।।

मन की बातें मन में रखना,
कहे, तो सच में खैर नहीं ।
उलटफेर सब हो जाएगा ,
मत लेना तुम बैर कहीं ।

मार्कण्डेय त्रिपाठी

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