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मार्कण्डेय त्रिपाठी

ओमिक्रान

ओमिक्रान के रूप में देखो ,
फिर से कोरोना फैल रहा है ।
हाहाकार मचा पश्चिम में ,
हमने भी यह मैल सहा है ।।

भयाक्रांत है जन मानस फिर,
पता नहीं हे प्रभु क्या होगा ।
दो डोज वैक्सीन लगवाए हम,
बहुत कष्ट हम सबने भोगा ।।

दो वर्षों के बाद किसी विधि,
दौड़ रही जीवन की गाड़ी ।
फिर से पटरी से गर उतरी ,
बन जाएंगे सभी कबाड़ी ।।

लापरवाही बरत रहे हम ,
मास्क लगाना भी हैं भूले ।
कहते घुटन होती है इसमें ,
कब तक यूं मुंह ढककर झूलें ।।

दो गज दूरी विस्मृत है अब,
बाजारों में भीड़ बढ़ी है ।
सेनेटाइजर कौन लगाए ,
सबकी भृकुटी आज चढ़ी है ।।

जनता पर ही सभी नियम हैं,
नेताओं पर असर न होता ।
बदस्तूर करते हैं रैली ,
सभी लगाते इसमें गोता ।।

भीड़ जुटती लाखों की है ,
जिम्मेदार कौन है इसका ।
किसे फिक्र है कोरोना की ,
भला नाम लेंगे हम किसका ।।

चुनावी प्रक्रिया शुरू है ,
लोकतंत्र उत्सव आया है ।
भंग पड़ी कुएं में देखो ,
गजब कोरोना की माया है ।।

बिना मास्क के नेता घूमें ,
असर नहीं उन पर कुछ होता ।
केवल जनता ही पिसती है ,
भला कौन नियमों को ढोता ।।

यही हाल सारी दुनियां की ,
कोरोना की अद्भुत माया ।
भेदभाव कर रही बिमारी ,
बदल गई है इसकी काया ।।

न्यूज़ देखकर टी, वी, पर अब,
आ जाता है हमें पसीना ।
पता नहीं क्या होने वाला ,
बड़ा कठिन है सच में जीना ।।

लाक डाउन अब लगे न फिर से,
हमको नियम निभाना होगा ।
अभी कोरोना गया नहीं है ,
लोगों को समझाना होगा ।।

मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

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