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डॉ0 हरि नाथ मिश्र

शीत-शोभा
ठिठुरन से भरी शाम जब बर्फीली होती है,
धधकती आँच भी तब आग की शर्मीली होती है।
आसमाँ साफ-निर्मल-स्वच्छ,चाहे रहे जितना-
पर धूप सूरज की भी बड़ी शर्दीली होती है।।
   कहीं पर खेत सरसों के छटा अद्भुत बिखेरे हैं,
   मटर के फूल औ फलियाँ मगन खेतों में पसरे हैं।
    निकलती सोंधी खुशबू जो फफकते गुड़ कड़ाहों से-
    महकती हर दिशा मानो,बड़ी रसीली होती  है।।
टमाटर-मूली-गाजर से धरा-शोभा कहीं बढ़ती,
कहीं गेहूँ की बाली देख,बला हलधर की भी घटती।
शलजम-गोभी-आलू से सजी सीवान यूँ समझो-
बड़ी मन-भावनी,नटखट,अदा छबीली होती है।।
   कहीं पर क्यारियाँ महकें हरी धनिया औ लहसुन से,
    कहीं पर खेत सब बिलसें,चुकन्दर-गंजी-बैगन से।
    हरी मेंथी,हरी पालक औ सागा प्याज भी लहरें-
    हरे मिर्चे की भी तासीर,बड़ी नशीली होती है।।
लटकतीं छप्परों से लौकियाँ,मनभावन लगतीं हैं,
हवा सँग अठखेलियाँ करतीं,बड़ी लुभावन लगतीं हैं।
बगल में खेत अरहर का,भरा गदरायी फलियों से-
हँसी फूलों औ फलियों की,बड़ी सुरीली होती है।।
    ताज़ा ईख के रस संग, मटर-मिश्रित-कचालू-दम,
    जिसका सेवन करते सब,दोपहर में गरम-गरम।
    साथ में चटनी धनिया की हरे लहसुन की खुशबू मस्त-
    हरी चटनी बड़ी स्वादिष्ट औ चटकीली होती है।।
आबो-हवा शरद की,बड़ी ही सेहतमंद होती है,
आती जो इसके बाद,वो ऋतु वसंत होती है।
रहता छुपा जिसमें सदा,एक दीप  आशा  का-
रौशनी जिसकी  सतत  चमकीली होती है।।
ठिठुरन से भरी शाम जब बर्फीली होती है।
धधकती आँच भी तब आग की शर्मीली होती है।।
             ©डॉ0 हरि नाथ मिश्र
             9919446372

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