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डॉ0 हरि नाथ मिश्र

   गीत (16/14) गीत

हम भारत के वासी हमको,
कण-कण इसका प्यारा है।
गर्व सदा है भारत पर ही-
भारतवर्ष हमारा है।।

सदियों पहले रहा विश्व-गुरु,
जीवन-सूत्र दिया जग को।
आज वही है गरिमा इसकी,
देता मूल मंत्र सबको।
पूरब-पश्चिम,उत्तर-दक्षिण-
करता उर-उजियारा है।।
    भारतवर्ष हमारा है।।

कहीं खेत फसलों से लहरें,
कृषक अन्न उपजाते हैं।
कहीं बाग में फल भी पकते,
मीठे फल सब खाते हैं।
बादल उमड़-घुमड़ नभ बरसें-
बहती सरिता-धारा है।।
      भारतवर्ष हमारा है।।

ऋतुओं का यह देश निराला,
ऋतु वसंत-छवि न्यारी है।
विविध पुष्प उपवन में खिलते,
विलसित अनुपम क्यारी है।
हृदय-हरण कर प्रकृति मोहिनी-
देती शुचि सुख सारा है।।
      भारतवर्ष हमारा है।।

कश्मीर-शीष है मुकुट सदृश,
शोभा लिए हिमालय की।
गिरि-गह्वर में बसे देव-घर,
पूजा रुचिर शिवालय की।
सिंधु उमड़ता दिशि दक्षिण का-
सब कुछ लगता न्यारा है।।
     भारतवर्ष हमारा है।।

मंदिर-मस्ज़िद-गुरुद्वारे जो,
गिरजाघर भी यहाँ बने।
सबने अलख जगाई जग में,
भाव वही जो प्रेम सने।
बने विश्व परिवार एक जब-
रहता भाई-चारा है।।
     भारतवर्ष हमारा है।।
               ©डॉ0 हरि नाथ मिश्र
                   9919446372

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