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डा. नीलम

*होली आई*

बहुत हुआ अब छोड़ो लड़ाई
गले मिलो छोड़ो रिसाई
क्यों हो इकदूजे से खफा भाई
देखो मिलन की होली आई

चले फागुनी हवाओं ओ'
खिले गेंदा ,टेसू पलाश
रंगों से भर गए सभी
कानन,कुँज,और बाग

भौंरों की गुनगुन सुन
नाच रहे पुष्प गुच्छ आज
थाप पड़ी मृदंग पर तो
नाचने लगे गोप-ग्वाल

चंग उठाओ,ढोल बजाओ
भीतर अपने कुछ तरंग जगाओ
लाल,गुलाबी, नीले,पीले रंगों में
रंग जाओ यार, होली है भई आई।

          डा. नीलम

*होली*

नीले पीले लाल गुलाबी
रंगों की बरसात हुई
शोरगुल ,हुड़दंगियों की
मौज मस्ती होती रही

निकल पड़ी टोलियां घरों से
अपनी-अपनी उम्र की
किसी के भाल टीका,किसी के पग पर गुलाल धरे

हमउम्र की बात न पूछो
भर अंजुरी इकदूजे को रंगे
धौलधप्प,हँसी -ठिठोली
कहीं बरजोरी से खेले होली

कहीं निकल पड़ी वानर टोली
भर पिचकारी, भरे गुब्बारों से खेलें होली/धरपकड़ करउठाए लें ,दे छपाक पानी में डालें

घर,आँगन,गली मौहल्ले सब
रंगों में भीग रहे /धरा उड़ाय
गुलाल,अबीर /हवाएं ले रंग अंबर के मुख को रंग आए।

       डा.नीलम

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