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अनूप दीक्षित राही

 मुहब्बत की फिर से जरा शुरुआत तो कीजिए।

अजी एक बार हमसे मुलाकात तो कीजिए।।

*

दरम्यां क्यों हो गये हैं इतने से फासले।

जरा अपने आप से तहकीकात तो कीजिए।।

*

सूखा पड़ा था कबसे मेरे दिल के दरीचे मे।

थोड़ी सी चाहतों की बरसात तो कीजिए।।

*

कितने सावन आये और आकर बरस गये।

जाना आके ज़िन्दगी मे कुछ करामात तो कीजिए।।

*

नाकाबिल समझ कर हरदम तुम दूर ही रहे।

काबिलियत पर मेरे इतने न सवालात तो कीजिए।।

*

आया हूं तेरे शहर मे बनकर के मुसाफिर।

अपना न सही गैर ही समझकर कुछ बात तो कीजिए।।

*

अनूप दीक्षित"राही

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