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विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर छोटी सी कविता "जीवन है मुक्ति का धाम, जप रघुपति राघव राजा राम।" - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल की क्लिक कर पूरा पढ़े।

विश्व तम्बाकू निषेध दिवस पर छोटी सी कविता "जीवन है मुक्ति का धाम, जप रघुपति राघव राजा राम।" - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल की क्लिक कर पूरा पढ़े। जीवन   है   मुक्ति   का  धाम, जप  रघुपति  राघव राजा राम। नशा  करे  जो  आह  भरे, लग जाये जीवन पे विराम प्रेम   पिलाया   जो   पिये नशा  करे  हर  सुबहे शाम। कश  लेने  पे  लगाओ  विराम, जप  रघुपति  राघव राजा राम। क्यों करते हो नशा डटकर, लिये  हाथ  में  लिये  साथ। संकट   जब   बढ़   जायेगा कैसे  दोगे  अपनों का साथ। जीवन   है   मुक्ति   का  धाम, जप  रघुपति  राघव राजा राम। परिवारों  पर  दो  तुम  ध्यान,  रटते   रहो    राम   का  नाम। लेते रहोगे जब  कश पर कश नहीं मिलेगा  कहीं  यश काम। नहीं   करोगे   ढंग   से  ...

आइये पढ़े "वर्तमान में दरकते रिश्ते" - दयानन्द त्रिपाठी की रचना क्लिक कर पूरी पढ़े आपका प्यार कविता को मिलेगा।

आइये पढ़े "वर्तमान में दरकते रिश्ते" - दयानन्द त्रिपाठी की रचना क्लिक कर पूरी पढ़े आपका प्यार कविता  को मिलेगा। शीर्षक - वर्तमान में दरकते रिश्ते ==================== भौतिकवादी   युग  परिवेशों  में रिश्ते  खण्ड-खण्ड  होते जा रहे, सुख-दुख बांटने की अनुभूति में एकल    रिश्ते    होते    जा   रहे वर्तमान      में     दरकते    रिश्ते, न्यूक्लियर  से  होते  जा  रहे। मार्डन  एहसासों  के  जग में रिश्तों के अभाव होते जा रहे जिनकी   खातिर   सारी  उम्र बुजुर्ग  बोझों  से दबते जा रहे वर्तमान    में    दरकते   रिश्ते, संवेदन शून्य होते जा रहे। सपनों  को पाला पोशा  इतना परिवारों में भाव मिटते जा रहे कारण   व   निवारण   क्या  है वर्तमान में रिश्ते दरकते जा रहे। खूब   संजोया   सपना   अपना दर्द है ऐसा सब बिखरते जा रहे खु...

हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर कविता "कोटि-कोटि नमन करता हूँ, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का" पत्रकार बन्धुओं को समर्पित साथ ही हार्दिक शुभाकमनएं और बधाई।

हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर कविता "कोटि-कोटि नमन करता हूँ, लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का" पत्रकार बन्धुओं को समर्पित साथ ही हार्दिक शुभाकमनएं और बधाई। 'हिन्दी पत्रकारिता दिवस'             30 मई पर एक कविता  """"""""""""""""""""""""""""""""""""""""""" आज ही का शुभ दिन जब  पहला हिन्दी अखबार छपा,  हिन्दी भाषी लोगों में जब  जुगुल किशोर का प्यार छपा।  हिन्दी पत्रकारिता दिवस की  हिन्दी जगत् को बहुत बधाई,  हिन्दी के दुर्दिन काल में तब  हिन्दी का सूरज दिया दिखायी।  पराधीन उस काल खण्ड में  जन-जन का उद्गार छपा।.......  तीस मई अट्ठारह सौ छब्बीस  हिन्दी का परचम लहराया,  "उद्दन्त मार्तण्ड " नाम पड़ा  साप्ताहिक अखबार छपवाया।  भ्रष्ट, क्रूर, व्यभिचारी, हिंसक  अंग्रेजों का अत्याचार छपा।.......  कोटि-कोटि नमन करता हूँ  लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ का,  उस सत्य के सत...

आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर छोटी सी कविता "हिन्दी शिक्षा है आधार तुम्हारा, कलम बना है हथियार प्यारा" पत्रकार बन्धुओं को समर्पित साथ ही हार्दिक शुभाकमनएं और बधाई।

आज हिन्दी पत्रकारिता दिवस के अवसर पर छोटी सी कविता "हिन्दी शिक्षा है  आधार तुम्हारा, कलम बना है हथियार प्यारा" पत्रकार बन्धुओं को समर्पित साथ ही हार्दिक शुभाकमनएं और बधाई।    तुम सच्चाई दिखलाते हो.... """"""""""""""""""""""""""""""""""""" हिन्दी शिक्षा है  आधार तुम्हारा कलम  बना  है  हथियार प्यारा, कांटो    में    राह    बनाते    हो तुम   सच्चाई    दिखलाते   हो। निर्भय निश्छल हो पथ पर चलकर सामाजिक दर्दों को सामने लाते हो कितने उलहनाओं को  सुन सहकर संवेदनाओं को नई दिशा दे जाते हो। कैसा  भी  हो   संकट   सारा राष्ट्र  समर्पण   भाव   तुम्हारा लोकतंत्र  के  चौथेस्तम्भ  की भूमिका का है कर्तव्य तुम्हारा। बिना  डरे  कर्म पथ  पर  चल पड़े कलम का प्रभाव लिए निकल पड़े दृढ़  निश्चय   संकल्प   बिना   भय  भाषा की मर्यादा में खड़े रहे अड़े। कभी दर्द बन कभी अश्रु बन अन्याय...

महराजगंज : "एक गीत की तरह कोई आवाज़ आती है..." डॉ० प्रभुनाथ गुप्त विवश की नई रचना क्लिक कर पूरु पढ़ें।

महराजगंज : "एक गीत की तरह कोई आवाज़ आती है..." डॉ० प्रभुनाथ गुप्त विवश की नई रचना क्लिक कर पूरु पढ़ें। "एक गीत की तरह"                    एक कविता  """"""""""""""""""""""""""""""""""""" एक गीत की तरह  कोई आवाज़ आती है  मीठी सी प्यारी सी  कदाचित् वह कोयल है जो  गीत गाती है  हर सुबह हर शाम......... जगाकर मेरे सुप्त हृदय को  खो जाती है या  छिप जाती है नीड़ में  बस देखता रहता हूँ देर...तक  उस छायादार बृक्ष को  हर सुबह हर शाम...... .... फिर जाती है नज़र  सामने की खिड़की पर जो  खुलती है ....फिर बन्द हो जाती है फिर खुलेगी जब...... मुझे नींद आने को होगी देखता रहता हूँ उसी को  हर सुबह हर शाम ........... कितनी निष्ठावान है वह कोयल वह चेहरा जो  छिपाये हुए है हृदय में कसक, वेदना और पीड़ा को  और मैं.. ....चौंक पड़ता हूँ ज़रा सी आहट पर  कदाचित् वो.... आयें  जोहता हूँ राह  हर सुबह हर शाम.......... ...

नई रचना चिलचिलाती गर्मियों के दरमियां, इक बात कहनी है, सूरज की तपिश से हैं परेशां, इक बात कहनी है - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल क्लिक कर पूरी रचना पढ़े।

नई रचना चिलचिलाती गर्मियों के दरमियां, इक बात कहनी है, सूरज की तपिश से हैं परेशां, इक बात कहनी है -  दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल  क्लिक कर पूरी रचना पढ़े। सूरज की तपिश  =======//======= चिलचिलाती गर्मियों के दरमियां       इक बात कहनी है, सूरज की तपिश से हैं परेशां      इक बात कहनी है।। चढ़   रहे   पारे  सा  दिन   धूप नहीं  है   शीतल   छाया   कहीं प्यासे   हैं   सब   पंक्षी   पथिक कट     रहे     हैं     वृक्ष     सारे इक       बात       कहनी     है। ऐ     खुदा     रहम     कर    तूँ थोड़ी   राहत    अता    कर   तूँ पांव     में      छाले     पड़े     हैं जीवन  ...

गुरु जी लोगों ! नौकरी और जलवा दोनों विरोधाभाषी शब्द हैं आप क्या कहते हैं ? क्लिक कर पढ़ेंं यह रचना

गुरु जी लोगों ! नौकरी और जलवा दोनों विरोधाभाषी शब्द हैं आप क्या कहते हैं ? क्लिक कर पढ़ेंं यह रचना  सब  कुछ   खोकर,          थोड़ा  पाना.. जीते   जीते,  मरते                    जाना.. यही हक़ीक़त  यही                फ़साना.. यह    जीवन    का            ताना-बाना.. लेकिन कभी निराश                  न होना.. मोती    जैसे   सीप               में  रखना.. वही   दिखाना  जैसे                  दिखना.. पानी  से   पानी  पर                  लिखना.. सर्वाधिकार सुरक्षित:@"शजर"