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संदेश

ऊषा जैन कोलकाता

🙏*मेरे कान्हा*🙏 कान्हा छोड़ न देना मेरा  हाथ से विश्वास कान्हा दोगे साथ जब कोई न मेरे साथ हो   पर मन में ये विश्वास हो।   तुम थाम ले मुझे  कृष्णा  दोगे सदा मुझे सहारा।  मन निशदिन भटक रहा ।   उलझनों में उलझ रहा।   राह तुही दिखादे अब।  मरीचिका से निकले हम।  गिरने ना देना मुझे कान्हा ठोकर लगे जब पाँव मै।  कश्ती न डगमगाते मेरी।  घिर के कभी तुफान में।  बल्ली लगा देना कृपा की ।  मिल जा़ये  कृष्णा किनारा।  🙏🌹*सुप्रभात*🌹🙏 ऊषा जैन कोलकाता

एस के कपूर श्री हंस

*।।रचना शीर्षक।।* *।। सोच में अपने बस जीत का* *ही नाम रखो।।* *।।विधा।।मुक्तक।।* 1 मन में सपनें   और  हौसलों में   उड़ान      रखो। जीतने को   तुम पूरी जमीन आसमान       रखो।। बुद्धि विवेक  आशा विश्वास सब मंत्र सफलता के। कदापि निराशा   नहीं  आये बस यह ध्यान रखो।। 2 सितारों से आगे   तक    भी जहान               है। साहस के   सामने  दूर  नहीं जीत का निशान है।। हार से होकर ही   निकलता है  जीत   का रास्ता। अंधेरा ढल के फिर सुबह ये विधि का विधान है।। 3 जान लो कि   व्यक्तित्व  की अपनी जुबान होती है। तभी जाकर     किसी    की बात महान  होती है।। जो टूट कर भी     खुद   से गर         हारा नहीं। तब फिर जीत ही  आखिरी मुकाम    होती है।। 4 दिल में अरमानओ हौंसलों में    उड़ान   रखो। मनोबल ...

एस के कपूर श्री हंस

*।।ग़ज़ल।।   संख्या 156   ।।* *।।काफ़िया।।      आने      ।।* *।।रदीफ़।। को जी करता है।।* 1 अब वही बातें बनाने को जी   करता है। तेरे पास लौट कर आने को जी करता है।। 2 जाने कहाँ गुम हो गए हैं  वह सब दिन। तेरे पहलू में सर छुपाने को जी करता है।। 3 आप से ही तो थे हमारे दिन रात रोशन। आप को फिर अपनाने को जी करता है।। 4 जाने क्या क्या नादानी कर बैठे हम भी। अपनी गलती समझाने को जी करता है।। 5 क्यों कैसे कब यह आ गई   थी  दूरियां। आज सब कुछ भुलाने को जी करता है।। 6 महसूस होता नहीं तुम्हारे बिन वजूद हमारा। तुम पर  जान लुटाने  को  जी करता है।। 7 वही नगमें वही अंदाज़ लौट कर आ जाये। अब फिर साथ में ही गाने को जी करता है।। 8 *हंस* तुम्हारे बिन जिंदगी कोई जिंदगी नहीं। तुम्हारे लिए जीने मर जाने को जी करता है।। *रचयिता।। एस के कपूर "श्री हंस"* *बरेली।।* *©. @.   skkapoor* *सर्वाधिकार सुरक्षित*

रामनाथ साहू ननकी

प्रीत पदावली  ---- 17/11/2021                    ------ मस्तमौला ----- हम मस्तमौला फकीर ।        बँधे नहीं हैं किसी डोर से ,                   न जकड़े कहीं जंजीर ।। मान न खोजूँ कभी किसी पग ,                      आत्मानुभूति गंभीर । अंतर्मुखी सिद्ध सिंहासन ,                    दृढ़ संकल्पी बलवीर ।। सब आडंबर त्याग चले हैं ,                      छाप तिलक तस्वीर । अपरिग्रही संयम सत साधक ,                       नित्यानंद दिलगीर ।। है अभेद निर्लिप्त महा मति ,                    केवल्य साधन शरीर । मित्र शत्रु के भाव न समझे ,                    मस्त असंगी प्राचीर ।। निय...

विजय कल्याणी तिवारी

/  कबीर -- 10  / --------------------------- मन से जो जीता नही सकल जीत तब व्यर्थ उस मनुष्य के हाथ से होते सदा अनर्थ । मन कारक संसार में भले बुरे का मीत मन के कारण हार है मन के कारण जीत। कह कबीर भव बंध से मन को पार उतार मन के शुभ संदेश को समझ सदा उपहार। झुके माथ प्रभु चरण में कटे जनम के दोष नित संतुलन बना रहे घटे न अंतस जोश। कबिरा जग मन भाव से जीवन जगत प्रसिद्ध नोच नही अंतर हृदय सपनेहु बन कर गिद्ध। मन उपवन के गंध से मोहित सकल समाज ऐसे मन का विश्व पर रहे दिवस निशि राज।। विजय कल्याणी तिवारी, बिलासपुर छ.ग. / कबीर -- 9 / ------------------------- कह कबीर मन मे दया जो रख सका महान नीर नयन भर बांटता सच्चा वह इंसान । भाव भगति सचमुच सखा जीवन के आधार नेक राह पर जो चले पाए वह उपहार । क्षुद्र क्षुधा से लड़ सके इतन अंतस प्राण नहि संदेह कभी कहीं फिर मिलने मे त्राण। कबिरा कलम कठोर हो लिखकर उगले आग शीतल जल मय हों भरे अंबुज खिले तड़ाग। नयन देख करूँणा भरे बरसे बनकर नीर पीर देख होने लगे मनुआ मनुज अधीर। सुन कबीर के सीख को अंतर हृदय उतार। कुंठा कलुष कलेश पर चल कर वज्र प्रहार। विजय कल्याणी तिवारी, ब...

मार्कण्डेय त्रिपाठी

अध्यात्म और कला अध्यात्म सच आत्म बोध है , आत्म साक्षात्कार मार्ग यह भाई । मानवीयता पर आधारित , पथ दर्शक सिद्धांत,भलाई ।। सृजन, अस्तित्व, सत्य सब कुछ का, मानवजन्य क्रिया अद्भुत है । ईर्ष्या, द्वेष, घृणा इन सब का, विध्वंसक,भाव अच्युत है ।। व्यक्ति, समाज, देश के भीतर, बहती इसकी शुचि धारा है । द्वंद्व सदा मिटता है इससे , आत्म शक्ति का यह नारा है ।। प्रेम भाव स्पंदन करती , कला भी इसमें नित शामिल है । कला रूह है मानवता की , इसके बिना जगत् काहिल है ।। सत्ता और व्यवस्था से सच, मूल रूप इसका आहत है । भोग रूप में प्रस्तुत है यह , जो मानव हित में बाधक है ।। कला नुमाइश बनी आज है, कलाकार अब दरबारी है । सुन्दरता बेची जाती है, पता नहीं क्या लाचारी है ।। आध्यात्मिक प्रक्रिया मिथक से, आज यहां जोड़ी जाती है । अवतारों को तोड़,ताड़कर , मूल छबि मोड़ी जाती है ।। मूल्य अंधश्रद्धा बन जाता, बस भावुकता छा जाती है । पाखंड हावी हो जाता, कर्मकांड में गति आती है ।। शोषण,भेद,लूट तब होता, भौतिकवादी सोच बिहसती । भारत की चेतना, ज्ञान तब, होकर लहूलुहान, सिसकती ।। रक्तरंजित,मानव विध्वंसक, सोच से कला ही मुक्ति दिलाती । कला...

नूतन लाल साहू

छोड़ दें क्रोध और फूल बन जाओ क्रोध तो ऐसा हुनर है, प्यारें जिसमें फंसते भी है और उलझते भी आप है। इसीलिए छोड़ दें,क्रोध को नही तो, पाछे पछताओगे क्योंकि क्रोध के कारण ही अक्सर लोग पिछड़ जाते है इसीलिए छोड़ दें,क्रोध को प्यारें। तुम फूल बनकर के तो देखो कांटे भी,सुरक्षा में लग जायेंगे, समय कहता है,तुम प्लान करो सबसे पहले भाग्य कहता है,तुम फूल बनो सबसे पहले। अगर तुम,फूल बनते हो तो सब मित्र,बन जायेंगे तुम्हारें, आदिकाल से, प्रिय है सबको तुम फूल बन जाओ, प्यारें। चाहे सुबह हो,चाहे शाम हो तेरा आदर,सब कोई करेंगे, फूल के आगे, नतमस्तक तो सारे जहां है। क्रोधी को, कोई भाता नही है इस सारे जहां में क्रोध तो ऐसा हुनर है, प्यारें जिसमें फंसते भी है और उलझते भी है। मुट्ठी बांध कर,आया है जग में हाथ पसारे जाना है अगर कुछ पहचान बनाना है तो फूल बन जाओ, प्यारें। नूतन लाल साहू देखोंं, ऐसे टूट न जाना सुख पर्वत की विशालता में नही है शायद एक कण में है सुख वर्षो की सुदीर्घता में नही है शायद एक क्षण में है। सुख, दुःख का और दुःख,सुख का मीत है बुने जाते है,करीने से। शिकायत अगर कोई रखता हो तुमसें पलट के तुम उससे शिकाय...