अध्यात्म और कला अध्यात्म सच आत्म बोध है , आत्म साक्षात्कार मार्ग यह भाई । मानवीयता पर आधारित , पथ दर्शक सिद्धांत,भलाई ।। सृजन, अस्तित्व, सत्य सब कुछ का, मानवजन्य क्रिया अद्भुत है । ईर्ष्या, द्वेष, घृणा इन सब का, विध्वंसक,भाव अच्युत है ।। व्यक्ति, समाज, देश के भीतर, बहती इसकी शुचि धारा है । द्वंद्व सदा मिटता है इससे , आत्म शक्ति का यह नारा है ।। प्रेम भाव स्पंदन करती , कला भी इसमें नित शामिल है । कला रूह है मानवता की , इसके बिना जगत् काहिल है ।। सत्ता और व्यवस्था से सच, मूल रूप इसका आहत है । भोग रूप में प्रस्तुत है यह , जो मानव हित में बाधक है ।। कला नुमाइश बनी आज है, कलाकार अब दरबारी है । सुन्दरता बेची जाती है, पता नहीं क्या लाचारी है ।। आध्यात्मिक प्रक्रिया मिथक से, आज यहां जोड़ी जाती है । अवतारों को तोड़,ताड़कर , मूल छबि मोड़ी जाती है ।। मूल्य अंधश्रद्धा बन जाता, बस भावुकता छा जाती है । पाखंड हावी हो जाता, कर्मकांड में गति आती है ।। शोषण,भेद,लूट तब होता, भौतिकवादी सोच बिहसती । भारत की चेतना, ज्ञान तब, होकर लहूलुहान, सिसकती ।। रक्तरंजित,मानव विध्वंसक, सोच से कला ही मुक्ति दिलाती । कला...