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संदेश

समझ रहे हैं चाल तुम्हारी - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

              ग़ज़ल-            समझ रहे हैं  चाल तुम्हारी,           वाणी क्यों वाचाल तुम्हारी।           मतलब  से  बातें  है  करता,           सोचो क्या है  हाल तुम्हारी।          शब्दों का  आडम्बर  रच कर,          नहीं लगेगी सुर ताल तुम्हारी।           अपना सदा अपना ही रहेगा,           काली है सब  दाल  तुम्हारी।           लाख सहारा  छल का  ले लो,           टूट  रही  सब  ज़ाल  तुम्हारी।           समय से पहले कुछ ना मिलेगा,           अब  ना  गलेगी  दाल  तुम्हारी।            भले  बनो  तुम  ज्ञान  सुभीता, ...

मृत्युगीत- जब मृत्यु की डोली आएगी....

मृत्युगीत- जब मृत्यु की डोली आएगी.... जब मृत्यु की डोली आएगी, व्याकुल साँसें, थम जाएगी। फिर सुंदर  सा  उत्सव होगा, जब मृत्यु  ब्याह  ले  जाएगी। बंद 1– मृत्यु के बाद विदाई की तैयारी..... श्वेत वसन तन को ढँक देगा, फूलों   से   श्रृंगार   सजेगा। मन ना होगा  शोक में  डूबा, मौन  समर्पण  हर्ष   रचेगा। शब्द    धरे    रह    जाएंगे, नयनों से भाषा बह जाएगी। जब मृत्यु की डोली आएगी, व्याकुल साँसें, थम जाएगी। बंद 2– सबका प्रेम का कैसे  ...... जो कह न सका कोई जीवन में, वो   निःशब्द   उजागर   होगा। छुपा  हुआ  जो  प्रेम  हृदय  में, वो   मुखरित   आकर    होगा। हर  भावना  चुप   राह  चलेगी, हर   विरह    मधुरता   लाएगी। जब  मृत्यु  की  डोली  आएगी, व्याकुल  साँसें,  थम  जाएगी। बंद 3– रिश्तों का अंतिम आलिंगन... चार कांधे  तन को ले जाएँ, मन   पीछे-पीछे   खोते ...

गुज़रे कल की बात पुरानी....... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

गुज़रे कल की बात पुरानी, सब  यादों   में   आई   है। फिर  सावन  में   बुआ  आईं, ठिठक-ठिठक कर धीरे-धीरे। कच्चे     रस्ते      टूटी     मेंड़ें, सोच  रहीं   हैं   नदियां   तीरे। अम्मा की बानी, तुलसी चौरा, सब    यादों   में   आई    है। संग बापू के जब निकलीं थीं सब  दुआर-परखा  छू  आईं, अम्मा  की वो ताखे  की सुई कोई  और  अब छू  ना  पाई झील सी सुनी उसकी आंखें  कुछ  ना  कुछ  ढरकाई  हैं। चश्मे  के   पीछे    धुँधला  सा अब सब धुँधला सा लगता है। नीम  का  झूला,   पीली  चूड़ी सब बस सपना-सा लगता है। उस  ठूँठ  तले  बैठी - बैठी, धीमे  सुर  में  गुनुगुनाई  हैं। पीपल बोले आ  बैठो बहना, बरगद ने भी  राह  जोह ली। गुड़ की डली, राखी की बातें फिर से मन में जगह जो...

तुम तो वापस लौट आओ.... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

गीत- तुम तो वापस लौट आओ.... बन   गया   जीवन    तमाशा, मन का  कोई  स्वर  सुनाओ। तुम तो  वापस  लौट आओ।। शब्द हैं पर मौन सारे, अर्थ जैसे धूल बनकर, हास्य के ही भीड़ में, भाव भी हैं झूठ बनकर। नाटक सजे,पर्दे उठे पर जंग जीवन बन गया, खुद से मिलना भूल बैठे दीप्ति कहीं पे सो गया छल- प्रपंचों  की   ये  माया, तोड़ दो,  सच को  जगाओ। तुम तो वापस लौट आओ।। भावनाओं की नुमाइश, मंच पर  होती निरंतर, दर्द पर भी तालियां हैं,स्वार्थ में है आंख अंबर। मन के भीतर मौन मानव का कोई सुनता नहीं, मुस्कुराहट की लपेटें, अब हृदय को चुभ रहीं। जो    मुखौटे    ओढ़    बैठे, उनको तुम  सच से हटाओ। तुम तो वापस लौट आओ।। दर्पणों में  धुंध सी है, और  चेहरा  पूछता  है, मैं कहां हूं? कौन हूं मैं? आत्मा ये खोजता है। शब्द जो शृंगार थे कल, आज  केवल  रंग हैं, बोलते  हैं  पर न  उनमें  भाव  का ही  ढंग है। तुम जो  नाटक  से  घबराए, मन की तुम...

मैं भी मौन हो जाऊँ तो फिर आवाजें कौन उठाएँगी..... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

कौन जलाएगा दीप यहाँ, जब साँझें खुद बुझ जाएँगी। मैं भी मौन हो जाऊँ तो फिर आवाजें कौन उठाएँगी।। सच्चाई के गालों पर, रोज तमाचे लगते हैं। फिर भी न्याय की मूर्ति आँखें बंद किए रहती है।। शब्दों की मंडी में हर सच बिकने को तैयार हुआ, पर बेचने वाले की नीयत, कब निर्दोष रहती है।। मंदिर, मस्जिद की देहरी पर, शोर कौन मचाएगा। मैं भी मौन हो जाऊँ तो फिर आवाजें कौन उठाएँगी।। कुछ चन्द्रमाओं ने स्याही ओढ़ी, चमक ओट हो गई। कुछ सूरज भी थक हार के, अंधेरे से घुलने लगे।। कलम की नोकें कुंद हुईं, शपथों ने दम तोड़ा जब, तब शब्दों के बेजुबाँ शव, ज़मीन में मिलने लगे।। जो जले हुए अक्षर हैं, उनको फिर कौन सजाएगा। मैं भी मौन हो जाऊँ तो फिर आवाजें कौन उठाएँगी।। कितनी सीताएँ जंगल-वन में आज भी निर्वासित हैं। कितनी मीरा आज जहर पीती हैं घर के आँगन में।। कितनी कल्याणियाँ चौखट पर, प्रश्न लिए सो जातीं, और सभ्यता गर्व लिए बैठी सिंहासन पर तन में।। इस चुप पीड़ा की आँखों को, फिर कौन रुलाएगा। मैं भी मौन हो जाऊँ तो फिर आवाजें कौन उठाएँगी।। धरती माँ की छाती चीर के, कोई खनिज लूट लाया। फिर पत्तों से पूछा गया, क्यों हरियाली सोई है।। नदियों...

यार व्याकुल तुम नहीं हो.....! - दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

यार व्याकुल तुम नहीं हो.....! धूप सी  लगने  लगी अब, हर घड़ी, हर शाम मुझको। यार व्याकुल तुम नहीं हो...! ख़त्म होने को चला है गीत जैसा प्यार मेरा। सूनी आँखों में बसी है अब धुएँ सी हार मेरा। छू   नहीं   पाती   हवाएँ, छू गई थी प्यार मुझको। यार व्याकुल तुम नहीं हो...! छूटते जाते हैं पल वो जो मिलकर संवारे। अब अधूरे से वो सपने जो मेरे थे तुम्हारे। बोलता हर क्षण व्यथा-सा, दर्द  का  संवाद  मुझको। यार व्याकुल तुम नहीं हो...! अब उजालों में भी जैसे घुल गया है एक साया। ज़िन्दगी का हर नज़ारा लग रहा है अब पराया। छिन गई मुस्कान भी अब, लग रहा उपहास मुझको। यार व्याकुल तुम नहीं हो...! बिन तुम्हारे अब समय भी जैसे ठहरा सा लगे है हर घड़ी की धड़कनों में  सिर्फ सन्नाटा लगे है। दर्पणों में भी न दिखती, अब कोई पहचान मुझको। यार व्याकुल तुम नहीं हो...! गीत जैसे मौन बैठे, तान सब बिखरी पड़ी है। भावनाओं की गली में, अब तन्हाई ही खड़ी है। बाँटने    वाला   नहीं   है,  अब कोई भी राग मुझको। यार व्याकुल तुम नहीं हो...! जब बहारें र...

मिली कुंडली ठीक-ठाक है, व्याकुल हृदय उलझा, पुरोहित..... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

क्या सफल परिणय बनेगा...... (परिणय के भाव-संवाद में पुरुष के अंतर्द्वंद्व को दर्शाती हुई कविता) मिली कुंडली  ठीक - ठाक है, व्याकुल मन उलझा, पुरोहित! क्या  सफल  परिणय  बनेगा? गुण सभी हैं मेल खाते, शील-संयम रुप सजा है। शब्द भी  रस  घोलते हैं,  दृष्टि मंडप  सा सजा है। कहें पिता अब और न सोचो, श्रेष्ठ सभी संयोग मिला है! मां कहती हैं अब गृहस्थी के जीवन का पहिया मिला है। मुहूर्त, लग्न, सब पूर्ण निर्णय, ज्योतिषी    संतुष्ट    भी    हैं, अब  न  कोई  संशय  बनेगा? ध्यान में वह है मेरे पर मन में संशय हो जाता है। शून्य-सी उसकी है चुप्पी, विचलित मन हो जाता है। नहीं पता है मुझे अभी तक उसके धड़कन की भाषा। क्या मिलन बस है निभाना या मधुरिम कोई आशा? हंसी ओट में देखूं उसको प्रश्न  कोई  छपे  नहीं  है? क्या मौन कभी संवाद बनेगा? मैं अग्नि समक्ष व्रत को ले लूं, सप्तपदी को पूर्ण करूं, क्या वह सच में चलेगी, साथ जब मैं मौन रहूँ? ये वाचा, व्रत-वचन सभी, सामाजिक संकल्प ही हैं? या हृदय के अंतस्थल में बात छिपे ...

ग़ज़ल- समझ रहे हैं चाल तुम्हारी-------दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

ग़ज़ल- समझ रहे हैं  चाल तुम्हारी,           वाणी क्यों वाचाल तुम्हारी।           मतलब  से  बातें  है  करता,           सोचो क्या है  हाल तुम्हारी।          शब्दों का  आडम्बर  रच कर,          नहीं लगेगी सुर ताल तुम्हारी।           अपना सदा अपना ही रहेगा,           काली है सब  दाल  तुम्हारी।           लाख सहारा  छल का  ले लो,           टूट  रही  सब  ज़ाल  तुम्हारी।           समय से पहले कुछ ना मिलेगा,           अब  ना  गलेगी  दाल  तुम्हारी।            भले  बनो  तुम  ज्ञान  सुभीता,            आंखें  क्यों  है  लाल  तुम्हारी।...

हम हैं खबरों के प्रहरी, कलम हमारी शान...........!!!!

हम हैं खबरों के प्रहरी, कलम हमारी शान। सत्य दिखाना धर्म हमारा, यही हमारा मान। हम हैं खबरों के प्रहरी, सच का जिनके संग निवास, हर लम्हा कलम चलाते, रखते जग में नई मिठास। धूप-छाँव हो या अंधियारा, हम तो रहते हैं तैयार, ना छुट्टी, ना कोई परवाह, पत्रकारिता है हमारो प्यार। हम हैं खबरों के प्रहरी, कलम हमारी शान। सत्य दिखाना धर्म हमारा, यही हमारा मान। जब सोती है सारा बस्ती, हम खोजें सच्ची बात, भीतर की हलचल लाकर दें जन को पूरे दिन की बात। आंधी हो या हो तूफ़ां, हम ना माने हार, क्योंकि कलम का है यह व्रत, और सत्य हमारा सार। हम हैं खबरों के प्रहरी, कलम हमारी शान। सत्य दिखाना धर्म हमारा, यही हमारा मान। उत्सव हो या शोक का पल हो, हम ही सबसे आगे, संकट की घड़ी में भी हम, सच्चाई के राग लगाए। भीड़ में जब सब चुप रहते, हम आवाज़ उठाते हैं, जनहित की खातिर लड़कर, सच को सामने लाते हैं। हम हैं खबरों के प्रहरी, कलम हमारी शान। सत्य दिखाना धर्म हमारा, यही हमारा मान। हर दिन नई चुनौती लेकर, फिर भी मुस्कान लिए, हर शब्द में उजियारा भरते, साहस बनकर जिए। हम ना केवल सूचनादाता, हम जनचेतना की जान, हम हैं सेवा के सिपाही, सच्चे...

मातृ भूमि पर मर - मिट जाएं यही है सच्चा हिंदुस्तान.....!!

प्रथम राष्ट्र संकल्प हमारा जीवन हो त्याग समान, मातृ भूमि पर मर - मिट जाएं यही है सच्चा हिंदुस्तान! शिक्षा यदि लाचार बनाए, त्यागो उसको छोड़ के आओ, राष्ट्र प्रेम जो भर न सके ऐसे व्यर्थ ज्ञान को आग लगाओ। यदि अमृत की चाह रखो तो विष भी पीना सीखो तुम, बलिदानों के जन्मे युग में चलो उसी पथ पर अब तुम। वह शिक्षा व्यर्थ अधूरी है, जो सर्वश्रेष्ठ का ना दे मान। मातृ भूमि पर मर - मिट जाएं यही है सच्चा हिंदुस्तान! क्षमता है जीवन का स्वर दुर्बलता है मृत्यु समान, राष्ट्र रहेगा तभी प्रखर जब त्याग करें सब वीर महान। न डरा काल से ना संकट से बनो शिवा सा विषधर आज, हर शत्रु के प्रहार से पहले दो रण में संकल्प का साज। जो राष्ट्र झुके मिट जाए वह, बस बचे वहीं वीरों का गान। मातृ भूमि पर मर - मिट जाएं यही है सच्चा हिंदुस्तान! अब शांति नहीं रणभेरी होगी शक्ति नीति के  काल का विजय हमारा लक्ष्य बना है प्रजाजनों के भाल का। राष्ट्रप्रेम हो धर्म हमारा कर्तव्य बने गीता का ज्ञान, उठो, चलो उस यज्ञ पथ पर, जहाँ हो केवल बलिदान। मृत्यु से जो डरे नहीं है, उस अमरत्व का रहता मान। मातृ भूमि पर मर - मिट जाएं यही है सच्चा हिंदुस्ता...

मैं श्रृंगार लिखूं कैसे, जब रण में रक्त बहाया जाए-----दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

मैं श्रृंगार लिखूं कैसे, जब रण में रक्त बहाया जाए? जब मां का आंचल जलता हो व्याकुल शस्त्र उठाया जाए। गूंज रही हैं क्रंदन-ध्वनियां, शंख नहीं अब तोपें बोलें, सरहद पर संकल्प लिए, अब वीर न आंसू से डोलें। मां के आंचल की रक्षा में, वक्षस्थल बन जाए दीवार, जब राष्ट्र पुकारे वीरों को, तब क्या रुकता है त्यौहार? गीत नहीं, जय घोष उठेगा हर पापी को मारा जाए। मैं श्रृंगार लिखूं कैसे, जब रण में रक्त बहाया जाए? कश्मीर नहीं अब करुणा मांगे, अब मांगे रण की ज्वाला, हर बर्फीली चोटी बोले मिटा दो कपटी दुश्मन मतवाला! झीलों का श्वेत वसन अब तो, रक्त-वर्ण में रंगा हुआ है, स्वर्ग धरा की संतानें अब, अंगारों में जला हुआ है। अब मूक नहीं सहना होगा, हर आंसू का उत्तर तलवार, शब्द नहीं अब अग्निवाण हों, हर छंद बने रक्षक-प्रहार। जहां वीरता मौन खड़ी हो, वहां श्रृंगार अधम बन जाए। मैं श्रृंगार लिखूं कैसे, जब रण में रक्त बहाया जाए? हे अर्जुन! गांडीव उठाओ, मत साधो मौन तपस्वी सा, हे राम! शर-संधान करो, जलाओ लंका धधकती सा। हे कृष्ण! चक्र घुमा दो फिर, नर्तन हो अंतिम संहार का, हे शिव! त्रिनेत्र प्रज्वलित कर दो, तांडव हो अत्याचार का। अ...

गीत - जिसके भाई पहलवानी कराया करें......

उससे हम क्यों भला दिल लगाया करें।  जिसके भाई  पहलवानी  कराया करें।।  उसका चेहरा भी चांद सा प्यारा लगे, पर भाई उसके हैं  जैसे अंगारा जले।  प्यार में पड़ गये तो जां चली जायेगी,   ऐसे  रिश्ते  से  बचके  किनारे  चलें।।   दिल को क्यों बेवजह तड़पाया करें? जिसके भाई पहलवानी कराया करें।   उस गली में कदम क्यों रखें हम कभी,   जिसके भाइय ने घूरा डरे हम सभी। हिम्मत तो थी पर थी जां भी तो प्यारी,    उसके भाई हैं अखाड़े के अधिकारी।   अपनी हड्डियां  क्यों  तुड़वाया करें? जिसके भाई पहलवानी कराया करें।।   प्यार में पड़ गये तो बड़ा रिस्क है  उसके भाई जमीं के खिसका डिस्क है।   फंस गये जो अगर तो गए काम से,   भाई उसके निपट लेंगे बड़े आराम से।   हम जवानी को क्यों यूं ही जाया करें,   जिसके भाई पहलवानी कराया करें।। उससे हम क्यों भला दिल लगाया करें।  जिसके भाई पहलवानी कराया करें।।         - दयानन्द त्रिप...

गीत- राम नाम की ज्योति जली है...... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

गीत- राम नाम की ज्योति जली है...... राम नाम की ज्योति जली है, व्याकुल मन में दीप जलाए। हर कोना अब गूंज उठा है, सिया-राम के गुण गाए।। धरा - धाम  पर  राम पधारे,  संग लिए  करुणा की सेना। न्याय खड़ा हर राजमार्ग पर,  प्रेम बना अब  धर्म सा सेना। शक्ति साधना  नारी रूपा,  हर  नारी  ही  दुर्गा  माने। सीता  की  मर्यादा  लेकर,  रावण से अब युद्ध हैं ठाने। शक्ति- प्रेम की ज्योति जली है, जग सारा आलोकित हो जाए। राम नाम की ज्योति जली है, व्याकुल मन में दीप जलाएं।। नवमी आई  राम-जन्म की,  पुण्य  पवन  हर  दिशा बहे। मन  के   रावण   को   मारो, ऐसा  हर  दिल  आज  कहे। चलो चलें फिर साथ सभी हम,  फिर  वो  अयोध्या   ले   आएं, जहां  न  कोई  भेद  रहे  अब,  जिससे  सबमें   राम  समाएं। हर नयनों में राम बसे हों, सबका मन मंगल ही गाए।   राम नाम की ज्योति जली है, व्याकुल ...

मन होता है घर जाने को...... दयानन्द त्रिपाठी व्याकुल

  गीत - मन होता है घर जाने को...... (पलायन की पीड़ा पर आधारित गीत है। जो एक श्रमिक के अंतर्मन की व्यथा को व्यक्त करने का प्रयास है।) धूल भरे इस जीवन पथ पर, छाले  हैं  हर  पग  की  रेखा। शहर दिखा सपनों का सागर, पर निकली इक सूखी रेखा। आँखों में जल दिल में उम्मीदें, थोड़ी  सी  रोटी है  थोड़ा चैन। वो माँ की  गोदी  फिर  पुकारे, जो   दे   दे   जीवन  को   रैन। वो तुलसी चौरा बुलाता है, दीया फिर से जलाने को। व्याकुल मन है मत रोको, मन होता है घर जाने को।। माटी की खुशबू से बढ़कर, कोई  इत्र  नहीं  लगता है। शहरों  की  रौशनी  में  भी, गाँवों का चाँद चमकता है। बचपन की आहटें आज भी, कानों  में  गूँज  रचाती  हैं। नीम  की  ठंडी  छाँव  तले, स्मृतियाँ झूला - झुलाती हैं। पिता के हल की मूठ पकड़, फिर खेतों में जाने को। व्याकुल मन है मत रोको, मन होता है घर जाने को।। कल फिर लौटूँगा निर्माणों में, ईंटों  से   सपन  सजा...

डा. नीलम

*गुलाब* देकर गुल- ए -गुलाब आलि अलि छल कर गया, करके रसपान गुलाबी पंखुरियों का, धड़कनें चुरा गया। पूछता है जमाना आलि नजरों को क्यों छुपा लिया कैसे कहूँ , कि अलि पलकों में बसकर, आँखों का करार चुरा ले गया। होती चाँद रातें नींद बेशुमार थी, रखकर ख्वाब नशीला, आँखों में निगाहों का नशा ले गया, आलि अली नींदों को करवटों की सजा दे गया। देकर गुल-ए-गुलाब......       डा. नीलम

मार्कण्डेय त्रिपाठी

दो दिन के मेहमान मोह पाश को तजकर बंदे, अपने को पहचान । जगत् में दो दिन के मेहमान ।। कहां से आया है, क्यों आया, क्या है जग से नाता । क्यों सब छोड़, तुम्हें जाना है, परम ज्ञान कब आता । कहां अंत में जाना होगा, जब निकलेंगे प्रान ।। जगत् में जो भी नजर तुम्हें आता है, वह सब कुछ है माया । रज्जु सर्प दृष्टांत बताता, नहीं सत्य,यह काया । कहता जो वेदांत जगत् हित, करो ज़रा तुम ध्यान ।। जगत् में कोई, कितना भी प्यारा हो, अंत समय त्यागेगा । साथ न देंगे जग के रिश्ते , कब तक यूं भागेगा । कब, यह बात समझ आएगी, झूठा हर अभिमान ।। जगत् में जन्म कहां,किस कुल में पाया, इसमें वश नहीं तेरा । पर, चरित्र और कर्मों से ही, भव बंधन का फेरा । कभी तो ध्यान लगाकर सुन, वंशीवाले की तान ।। जगत् में जीवन का कुछ नहीं भरोसा, कभी बुलाया आए । समय शेष है, अभी सुधर जा, जीवन व्यर्थ न जाए । साधु,संत की संगति में रह, कर मधुमय रस पान ।। जगत् में मार्कण्डेय त्रिपाठी ।

डॉ रघुनंदन प्रसाद दीक्षित प्रखर

आलेख               भारतीय काल गणना और नव संवत्सर                  ~~~~~~~~~~~~~~~~~~~          भारतीय नववर्ष का आरम्भ चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से होता है। हेमाद्रि के ब्रह्म पुराण में मान्यता है कि चैत्र शुक्ल प्रतिपदा को ही सृष्टि का निर्माण  हुआ, अत: इसी दिन  से भारत वर्ष की काल गणना की थी। हिंदू समय चक्र सूर्य सिद्धांत पर आधारित है। नव संवत्सर के इतिहास की चर्चा करें तो 'इसका आरम्भ शकारि महाराज विक्रमादित्य ने किया। भारतीय नववर्ष चैत्रमास के शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा से आरम्भ होता है। हेमाद्रि के ब्रह्म पुराण में इसी तिथि को पृथ्वी की रचना का वर्णन है। अत: यही तिथि काल गणना हेतु उचित मानी गयी। इस नव संवत्सर को भारतीय वर्ष भी कहा जाता है। महाराज विक्रमादित्य द्वारा  आरम्भ क्या गया था तो इन्हीं के नाम पर विक्रम संवत कहा गया। भारतीय काल गणना पंचाग पर आधारित है। इसके पांच अंग तिथि, वार, नक्षत्र, करण और योग होते हैं।     भारतीय काल गणना अनुसार, नव दिवस,...

अरुण दिव्यांश

विषय: वाणी दिनांक: 14 मार्च , 2023 दिवा : मंगलवार वाणी में ही भोर है , वाणी में ही शाम । यश अपयश मिले , वाणी तेरे ही नाम ।। वाणी ही आयाम है , वाणी ही है विराम । मानवता के शोध में , चलता है अविराम ।।  वाणी प्रेम जगावत , वाणी प्रेम भगाता है । वाणी अनल जगाता , वाणी अनल बुझाता है।। वाणी न बाड़ी उपजे , वाणी न हाट बिकाय । वाणी भाव समझ ले , शीश स्वयं लेता नाय ।। पूर्णतः मौलिक एवं अप्रकाशित रचना अरुण दिव्यांश डुमरी अड्डा छपरा ( सारण ) बिहार ।

रमाकांत त्रिपाठी रमन

जय माँ भारती 🙏जय साहित्य के सारथी 👏👏 💐तुम सारथी मेरे बनो 💐 सूर्य ! तेरे आगमन की ,सूचना तो है। हार जाएगा तिमिर ,सम्भावना तो है। रण भूमि सा जीवन हुआ है और घायल मन, चक्र व्यूह किसने रचाया,जानना तो है। सैन्य बल के साथ सारे शत्रु आकर मिल रहे हैं, शौर्य साहस साथ मेरे, जीतना तो है। बैरियों के दूत आकर ,भेद मन का ले रहे हैं, कोई हृदय छूने न पाए, रोकना तो है। हैं चपल घोड़े सजग मेरे मनोरथ के रमन, तुम सारथी मेरे बनो,कामना तो है। रमाकांत त्रिपाठी रमन कानपुर उत्तर प्रदेश मो.9450346879

रामबाबू शर्मा

. शीतलाष्टमी,*बास्योड़ा* की हार्दिक बधाई,मंगलमय शुभकामना...                      *हाइकु*                        ~~                  *शीतलाष्टमी*                         1                   शीतलाष्टमी                 अनुपम त्यौहार                   मंगलकारी ।                         2                  मात भवानी                 मनमोहक रूप                    मनभावन ।                         3 ...